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उपेंद्र कुशवाहा का तीखा संदेश, सरकार या पार्टी…क्या फिर टूटने की कगार पर है साथ?

पटना– खीर थ्‍योरी’ देने वो उपेंद्र कुशवाहा क्‍या फ‍िर अलग राह लेने वाले हैं? नीतीश कुमार से अदावत उनकी नई नहीं. इसी अदावत में उन्‍होंने पार्टी तक छोड़ी. लेकिन मजबूर‍ियों के चलते जब एक मंच पर नजर आए, गले मिले तो ऐसी बात कह दी क‍ि नीतीश कुमार को शायद ही पसंद आए. पटना में नीतीश से मुलाकात में उन्‍होंने साफ-साफ कह द‍िया क‍ि ‘नीतीश कुमार को समय और पर‍िस्‍थ‍ित‍ि की नजाकत को समझना चाह‍िए. उनके ल‍िए अब पार्टी और सरकार साथ-साथ चलाना ठीक नहीं. सरकार चलाने का उनको लंबा अनुभव है, हर कोई चाहेगा क‍ि ये लाभ राज्‍य को मिलता रहे, लेकिन उन्‍हें पार्टी अब दूसरों को सौंप देनी चाह‍िए. अब नीतीश कुमार को तय करना है क‍ि वह क्‍या फैसला लेते हैं. क्‍योंक‍ि इसमें देरी हुई तो शायद इतना नुकसान हो जाएगा क‍ि भरपाई मुश्क‍िल होगी

बिहार चुनाव से पहले उपेंद्र कुशवाहा का यह बयान सिर्फ सियासी बयान नहीं है, इसके मायने बहुत गहरे हैं. क्‍योंक‍ि अतीत की अदावत, बार-बार का साथ छोड़ना और भरोसे की चुपचाप टूटती डोर इस रिश्ते को जटिल बनाती रही है. नीतीश ने जब 2005 में कुर्सी संभाली तो उपेंद्र कुशवाहा को काफी उम्मीद थी. उन्‍हें लगा था क‍ि जिस नेता के ल‍िए उन्‍होंने इतना खून पसीना बहाया, वह इनाम जरूर देगा. मगर हुआ नहीं. हालात यहां तक आ गए क‍ि एक बार तो बतौर नेता प्रतिपक्ष जो बंगला मिला था उसे नीतीश ने फोर्स भेज कर खाली करा दिया था. 2009 में जब वो एनसीपी से वापस जेडीयू में आए तो ललन सिंह नाराज हो गए. 2010 में तो राजगीर अधिवेशन में मंच से ही कुशवाहा ने नीतीश को सुना दिया था. यहां तक क‍ि उन्‍होंने तानाशाह तक कह डाला. 2013 में खुद की पार्टी रालोसपा बनाई और नीतीश विरोध की राजनीति शुरू की. जब मोदी से नीतीश कुमार खफा हुए तो कुशवाहा का मौका मिल गया और वे बीजेपी के साथ आ गए. 2014 में मोदी कैबिनेट में मंत्री बने.
‘ज‍िस नाव में सवार होंगे…’
2017 में जब नीतीश भाजपा के साथ लौटे तो उपेंद्र कुशवाहा ने यहां तक कहा, नीतीश जिस नाव पर सवार होंगे, उसका डूबना तय है. 2018 में खीर थ्योरी देकर तेजस्वी से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की. 2021 में रालोसपा का जेडीयू में विलय कर एक और यूटर्न लिया. लेकिन 2022 में नीतीश फिर पाला बदलकर महागठबंधन में आ गए तो कुशवाहा फिर ‘हिट विकेट’ हो गए. लेकिन जब पूरा खेल पलट गया और नीतीश कुमार की एनडीए में एंट्री हुई तो मजबूरन हर बार उन्‍हें भागना ही पड़ा.
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