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लालू ने बनाया नया जातीय समीकरण YRK, Opinion: अब महज MY के भरोसे नहीं रहेगी RJD

नीतीश कुमार ने अपने 20 साल के शासन काल में कभी जाति-धर्म के आधार पर काम नहीं किया. दूसरे कारणों से उनकी आलोचना हो सकती है, पर इस मामले में तो कतई नहीं. बिहार की नई नवेली पार्टी जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भी बिना किसी भेदभाव के सबको साथ लेकर चलने का संकल्प लिया है. पर, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला आरजेडी शुरू से लेकर आज तक जातीय जकड़न से बाहर नहीं आया. तेजस्वी के पिता और आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय के नाम पर जो जातीय गोलबंदी की, वह बाद में मुसलमान-यादव (एम-वाई) समीकरण में बदल गई. लालू यादव को भरोसा था कि यादवों की 14 और मुसलमानों की 17 प्रतिशत आबादी पर उनकी पकड़ मजबूत हो गई तो सत्ता से बाहर जाने की नौबत कभी नहीं आएगी

उनका अनुमान 15 साल तक सही भी निकला. यादव-मुस्लिम गंठजोड़ की बदौलत लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की सत्ता पर 15 साल तक काबिज रहे. 2005 में नीतीश कुमार के उभार के बाद आरजेडी से मुसलमान दूर होने लगे. नीतीश ने अपनी तरकीबों से लालू के सामाजिक न्याय के किले को भी ध्वस्त कर दिया. नीतीश तब से बेखटके बिहार के सीएम बने हुए हैं. नीतीश ने भले अभी तक अपनी सियासी रणनीति को अक्षुण्ण रखा है, लेकिन आरजेडी की रणनीति बदलती रही है. लालू की सहमति से आरजेडी की कमान संभालने वाले तेजस्वी को अब भी लगता है कि उनके पिता ने जातीय समीकरण बिठा कर शासन किया तो सत्ता तक पहुंचने का आधार यही हो सकता है. वे कभी M-Y, कभी BAAP तो कभी A टू Z जैसे जातीय समीकरण की बात करते हैं.

वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में मिली कामयाबी से तेजस्वी इतने उत्साहित हैं कि उन्हें अब सत्ता हाथ में आती हुई दिखने लगी है. इसके लिए तरह-तरह के नए जातीय समीकरण गढ़ने में उनकी ऊर्जा जाया हो रही है. लालू से गुरुमंत्र लेकर तेजस्वी यादव-कुशवाहा-राजपूत (YKR) समीकरण बनाने में लगे हैं

.आरजेडी को अब लगने लगा है कि वर्ष 2020 में आरजेडी ने अगर 23.11 प्रतिशत वोटों का बंदोबस्त कर लिया तो इस बार उसे और 7-8 प्रतिशत वोटों की ही जरूरत पड़ेगी. सत्तासीन होने के लिए कम से कम 30 प्रतिशत वोटों का बंदोबस्त तो होना ही चाहिए. चूंकि वक्फ कानून और दूसरे मुद्दों पर मुसलमानों की एनडीए से नाराजगी और यादवों का तेजस्वी पर बढ़े भरोसे के कारण उन्हें उम्मीद है कि इस बार M-Y के 31 प्रतिशत वोट तो पक्का मिलेंगे. अगर पिछली बार की तरह किसी कारणवश ये वोट पूरे नहीं मिले तो 7-8 प्रतिशत अतिरिक्त वोटों का बंदोबस्त करना होगा. और, यह तभी संभव होगा, जब महागठबंधन किसी तरह एनडीए के वोट बैंक में सेंधमारी कर ले. यही वजह है कि तेजस्वी एनडीए के पारंपरिक वोटर दलितों पर डोरे डाल रहे हैं

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